शहडोल जिले के किसानों को धान, उड़द, मूंग और मिर्च की फसलों में कीट व रोगों की समय रहते पहचान और रोकथाम के तरीके बताए गए। कृषि विज्ञान केंद्र ने प्राकृतिक और जैविक उपायों को प्राथमिकता देने के साथ कृषि रसायनों के सुरक्षित उपयोग पर भी जोर दिया।

धान के खेत की नियमित निगरानी जरूरी

केंद्र के वैज्ञानिक डॉ. ब्रजकिशोर प्रजापति के अनुसार जिले में धान पर सफेद माहू, तना छेदक, तना गलन और शीथ ब्लाइट का प्रकोप देखा जा रहा है। किसानों को खेत की नियमित निगरानी कर शुरुआती अवस्था में ही नियंत्रण के उपाय अपनाने की सलाह दी गई।

धान के तनों पर सफेद माहू लगने से पत्तियां सुनहरी-पीली पड़ने लगती हैं। इसके नियंत्रण के लिए करीब एक लीटर नीम तेल को 200 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ छिड़कने की जानकारी दी गई। प्राथमिक रोकथाम के लिए निमास्त्र, ब्रह्मास्त्र और दशपर्णी अर्क को भी उपयोगी बताया गया।

मोजेक रोग और काले एफिड्स से ऐसे करें बचाव

मूंग और उड़द में मोजेक रोग सफेद मक्खी से फैलता है और इससे उपज में 50 से 60 प्रतिशत तक कमी हो सकती है। शुरुआती अवस्था में रोगग्रस्त पौधों को खेत से निकालने और सफेद मक्खी के नियंत्रण के लिए 3000 पीपीएम नीम तेल का 3 से 5 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर से घोल बनाकर छिड़कने की सलाह दी गई।

डॉ. दीपक चौहान ने बताया कि मिर्च में काले एफिड्स पत्तियों का रस चूसते हैं, जिससे पत्तियां मुड़ सकती हैं और पौधों की वृद्धि प्रभावित हो सकती है। इनके नियंत्रण के लिए नीमास्त्र को किफायती और पर्यावरण अनुकूल उपाय बताया गया।

उड़द से मिट्टी को भी लाभ

केंद्र प्रमुख डॉ. मृगेंद्र सिंह ने बताया कि उड़द की जड़ों में मौजूद राइजोबियम जीवाणु वायुमंडलीय नाइट्रोजन का स्थिरीकरण करते हैं। फसल अवशेष मिट्टी में मिलने से कार्बनिक पदार्थ बढ़ाने में मदद मिलती है और उड़द का उपयोग हरी खाद के रूप में भी किया जा सकता है। यह फसल लगभग 60 से 70 दिनों में तैयार हो जाती है।

कृषि विस्तार अधिकारी हिमानी और आत्मा परियोजना के बीटीएम तारकेश्वर ने छिड़काव के समय दस्ताने, मास्क, चश्मा, एप्रन और गमबूट पहनने की सलाह दी। किसानों से कहा गया कि छिड़काव सुबह या देर शाम कम हवा में करें, घोल को लकड़ी की छड़ी से मिलाएं और बंद नोजल को मुंह से फूंककर साफ न करें।