भाषा केवल बातचीत करने का माध्यम नहीं है। किसी भी समुदाय की भाषा में उसकी परंपराएं, सामाजिक जीवन, स्थानीय ज्ञान और दुनिया को देखने-समझने का तरीका पीढ़ियों से सुरक्षित रहता है। ऐसे में जब कोई भाषा धीरे-धीरे कम बोली जाने लगती है, तो उसके साथ उस समुदाय के ज्ञान और सांस्कृतिक विरासत के भी खोने का खतरा बढ़ जाता है।
इसी चुनौती को ध्यान में रखते हुए भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान जोधपुर (आईआईटी जोधपुर) के स्कूल ऑफ लिबरल आर्ट्स के सहायक प्रोफेसर डॉ. गुरूजेगन मुरुगेसन कम बोली जाने वाली भाषाओं पर शोध कर रहे हैं। उनके शोध में मैदानी अध्ययन, भाषा का दस्तावेजीकरण, व्याकरण का अध्ययन और भाषा के संरक्षण एवं पुनर्जीवन पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
दुनिया में वर्तमान में लगभग 7,164 भाषाएं बोली जाती हैं। इनमें से करीब 44 प्रतिशत भाषाओं को 1,000 से भी कम लोग बोलते हैं, जिससे इनके आने वाले दशकों में विलुप्त होने का खतरा बना हुआ है। डॉ. मुरुगेसन का शोध ऐसी भाषाओं को दर्ज करने के साथ-साथ यह समझने का प्रयास करता है कि इन भाषाओं में समुदाय का कितना ज्ञान और अनुभव सुरक्षित है।
डॉ. गुरूजेगन मुरुगेसन, सहायक प्रोफेसर, स्कूल ऑफ लिबरल आर्ट्स, आईआईटी जोधपुर ने कहा, “जब कोई भाषा संकट में आती है, तो केवल भाषा ही खतरे में नहीं पड़ती। उस भाषा में पीढ़ियों से जुड़ा सांस्कृतिक ज्ञान और जीवन जीने के तरीके भी प्रभावित होते हैं। इसलिए हमारा मैदानी अध्ययन भाषा को दर्ज करने के साथ-साथ उस ज्ञान को समझने पर भी केंद्रित है, जिसे समुदाय अपनी भाषा के माध्यम से आगे बढ़ाता आया है।”
थार क्षेत्र के भील समुदाय की भाषा और स्थानीय ज्ञान का अध्ययन
इस शोध का एक महत्वपूर्ण हिस्सा राजस्थान के ओसियां क्षेत्र में भील समुदाय के साथ किया जा रहा मैदानी अध्ययन है। थार के रेगिस्तानी वातावरण में रहने वाले इन समुदायों ने कठिन जलवायु परिस्थितियों के अनुरूप जीवन जीने के अपने विशिष्ट तरीके विकसित किए हैं। इनमें घर बनाने, भोजन, पहनावे और पानी के सीमित एवं समझदारी से उपयोग से जुड़ी कई पारंपरिक प्रथाएं शामिल हैं।
शोध में यह समझने का प्रयास किया जा रहा है कि समुदाय का यह स्थानीय ज्ञान उसकी भाषा से किस तरह जुड़ा हुआ है और नई पीढ़ी के बीच भाषा के कम होते इस्तेमाल का इस ज्ञान के आगे बढ़ने पर क्या असर पड़ रहा है।
आईआईटी जोधपुर की शोध टीम हर सेमेस्टर में मैदानी दौरे कर भाषाई जानकारी एकत्र करती है और समुदाय के सांस्कृतिक ज्ञान को भी दर्ज करती है। इस दौरान विद्यार्थियों को भी अपने से अलग समुदाय की भाषा, संस्कृति और जीवन को प्रत्यक्ष रूप से समझने का अवसर मिलता है।
मुंडारी की अनोखी संख्या प्रणाली से भाषाविज्ञान में नए शोध
शोध का दूसरा महत्वपूर्ण क्षेत्र मुंडारी भाषा है, जिसे झारखंड के मुंडा समुदायों द्वारा बोला जाता है। यह भाषा ऑस्ट्रो-एशियाटिक भाषा परिवार से संबंधित है।
शोध के दौरान एकत्र किए गए आंकड़ों के विश्लेषण से मुंडारी में एक विशिष्ट और दुर्लभ संख्या प्रणाली सामने आई है। इस खोज ने यह समझने के लिए नए सवाल खड़े किए हैं कि अलग-अलग भाषाओं में व्याकरणिक संरचनाएं किस तरह विकसित होती हैं।
शोध केवल इस विशेषता को दर्ज करने तक सीमित नहीं है। इसमें यह समझने का प्रयास किया जा रहा है कि ऐसी व्याकरणिक व्यवस्था इतनी दुर्लभ क्यों है, मुंडारी अन्य भाषाओं से किस तरह अलग व्यवहार करती है और किसी भाषा में व्याकरण की कौन-कौन सी संभावनाएं मौजूद हो सकती हैं।
इस तरह कम जानी-पहचानी भाषाओं का अध्ययन केवल उनके संरक्षण में ही मदद नहीं करता, बल्कि मानव भाषा की संरचना और विकास को समझने वाले सैद्धांतिक भाषाविज्ञान के लिए भी महत्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध कराता है।
प्रवासी समुदायों में विरासत की भाषा को समझना
शोध का तीसरा क्षेत्र विरासत की भाषाओं (Heritage Languages) पर केंद्रित है। ये वे भाषाएं हैं जिन्हें प्रवासी परिवार अपने घरों में बनाए रखते हैं, जबकि उनके आसपास के सामाजिक वातावरण में कोई दूसरी भाषा अधिक प्रचलित होती है।
एक सहयोगी शोध परियोजना के तहत स्विट्जरलैंड में दूसरी पीढ़ी के प्रवासी समुदाय के बीच तमिल भाषा का अध्ययन किया जा रहा है। इस समुदाय में तमिल का इस्तेमाल घर में होता है, जबकि व्यापक सामाजिक वातावरण में स्विस जर्मन और फ्रेंच का उपयोग किया जाता है।
शोध में यह समझने का प्रयास किया जा रहा है कि बहुभाषी वातावरण में पले-बढ़े बच्चों और युवाओं में विरासत की भाषा का विकास और उसका इस्तेमाल किस तरह प्रभावित होता है।
यह सहयोगी शोध स्विट्जरलैंड के यूनिवर्सिटी ऑफ लॉज़ेन की प्रो. अनिता ऑयर के साथ किया जा रहा है और इसे स्विस नेशनल साइंस फाउंडेशन तथा इंडियन काउंसिल ऑफ सोशल साइंस रिसर्च का समर्थन प्राप्त है।
इन तीनों शोध क्षेत्रों—मैदानी भाषाविज्ञान, सैद्धांतिक भाषाविज्ञान और समाजभाषाविज्ञान—के माध्यम से आईआईटी जोधपुर यह समझने की दिशा में योगदान दे रहा है कि भाषाएं कैसे विकसित होती हैं, उनमें ज्ञान कैसे संरक्षित रहता है और वे समाज एवं संस्कृति के साथ किस तरह जुड़ी होती हैं।






