जिले के मझौली विकासखंड की ग्राम पंचायत पांड की उर्मिला सिंह के लिए खेती केवल परिवार की जरूरतें पूरी करने का माध्यम थी। घर-परिवार की जिम्मेदारियों तक सीमित उनका जीवन तब नई दिशा की ओर बढ़ा, जब वह ग्रामीण आजीविका मिशन के स्व-सहायता समूह से जुड़ीं। कृषि के प्रति उनकी रुचि ने उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया और आज वह जैविक सब्जी उत्पादन के माध्यम से आत्मनिर्भर बनकर लखपति दीदी की श्रेणी में शामिल हो चुकी हैं।
उर्मिला को एकीकृत कृषि संकुल क्रमांक-2, पांड से जोड़ा गया। कृषि सखी के माध्यम से उन्हें आधुनिक एवं नवीन तकनीकी खेती, जैविक खाद तथा जैविक कीटनाशकों के उपयोग का प्रशिक्षण मिला। प्रशिक्षण में शामिल अन्य महिलाओं के साथ उर्मिला ने भी खेती की तकनीक सीखी, लेकिन कृषि के प्रति उनके विशेष लगाव और कुछ नया करने की इच्छा ने उन्हें इसे व्यवसाय के रूप में अपनाने के लिए प्रेरित किया।
30 हजार रुपये के ऋण से शुरू किया सब्जी उत्पादन
उर्मिला ने अपने एक एकड़ खेत में व्यावसायिक सब्जी उत्पादन शुरू किया। इसके लिए उन्होंने स्व-सहायता समूह के माध्यम से 30 हजार रुपये का ऋण प्राप्त किया और अच्छी गुणवत्ता वाले बीज खरीदे। उन्होंने जैविक संसाधन केंद्र से केंचुआ खाद तथा जैविक कीटनाशक के रूप में अधीनस्थ एवं ब्रह्मास्त्र प्राप्त कर उनका उपयोग अपनी फसल में किया।
मौसम के अनुसार अलग-अलग सब्जियों की खेती करते हुए उर्मिला ने उत्पादन और बिक्री का सिलसिला लगातार जारी रखा। स्थानीय हाट बाजार एवं साप्ताहिक बाजार में अपनी उपज का सीधे विक्रय कर उन्होंने बेहतर आमदनी प्राप्त की।
एक सीजन में 75 हजार रुपये की सब्जी बेची
उर्मिला की मेहनत का परिणाम भी सामने आया। पिछले सीजन में उन्होंने लगभग 75 हजार रुपये की सब्जियों का विक्रय किया। निरंतर मौसमी सब्जियों का उत्पादन और स्थानीय बाजार में बिक्री से उनकी आय में वृद्धि होती गई। खेती से होने वाली आय ने उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत बनाया और आज वह लखपति दीदी के रूप में अपनी नई पहचान बना चुकी हैं।
उर्मिला बताती हैं कि वह अपने खेत में उत्पादित सब्जियों में यूरिया का उपयोग नहीं करतीं। जैविक खाद और जैविक कीटनाशकों के माध्यम से फसल तैयार करती हैं। उनके अनुसार जैविक खेती से खेती की लागत को नियंत्रित करने के साथ गुणवत्तापूर्ण सब्जियों का उत्पादन किया जा सकता है।
“मुझे अपने पैरों पर खड़ा होने का रास्ता मिला”
उर्मिला अपनी सफलता का श्रेय ग्रामीण आजीविका मिशन, स्व-सहायता समूह, कृषि सखी और एकीकृत कृषि संकुल को देती हैं। उनका कहना है कि यदि उन्हें सही समय पर प्रशिक्षण, समूह से आर्थिक सहयोग और जैविक संसाधन उपलब्ध नहीं होते, तो शायद वह खेती को इस स्तर पर व्यवसाय के रूप में नहीं अपना पातीं।
वह आसपास की महिलाओं और किसानों को भी स्व-सहायता समूह एवं कृषि संकुल से जुड़ने की सलाह देती हैं। उनका मानना है कि प्रशिक्षण लेकर, समूह के माध्यम से आर्थिक सहयोग प्राप्त कर और जैविक संसाधनों का उपयोग करते हुए व्यावसायिक सब्जी उत्पादन अपनाया जाए तो ग्रामीण परिवारों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि की जा सकती है।
उर्मिला की कहानी, आत्मनिर्भरता की मिसाल
उर्मिला की कहानी केवल एक महिला की आर्थिक सफलता की कहानी नहीं, बल्कि ग्रामीण महिला सशक्तिकरण और आत्मनिर्भरता की मिसाल है। स्व-सहायता समूह से जुड़कर मिले अवसर, प्रशिक्षण को अपनाने की इच्छाशक्ति और निरंतर मेहनत ने उन्हें घरेलू जिम्मेदारियों तक सीमित महिला से सफल कृषि उद्यमी बना दिया।
आज उर्मिला अपने परिवार की आवश्यकताओं को बेहतर ढंग से पूरा करने में सक्षम हैं और आर्थिक रूप से सशक्त होकर अन्य महिलाओं के लिए भी प्रेरणा बन रही हैं। उनकी सफलता यह संदेश देती है कि “सही मार्गदर्शन और अवसर मिले तो ग्रामीण महिलाएं खेती को व्यवसाय बनाकर न केवल अपनी आय बढ़ा सकती हैं, बल्कि अपने परिवार के जीवन स्तर में भी बड़ा बदलाव ला सकती हैं।”


